Tuesday, September 4, 2012

“शोध की अहिंसक दृष्टि”

शोध की अहिंसक दृष्टि

                                    इस आलेख में इस प्रश्न पर विचार किया गया है कि शोध की अहिंसक दृष्टि क्या हो सकती है या क्या होनी चाहिए,और जब हम शोध की अहिंसक दृष्टि पर विचार करते हैं तब ये प्रश्न स्वतः ही आ जाते हैं कि क्या अब तक जो शोध हुए हैं या हो रहे हैं या होने वाले हैं क्या उनकी दृष्टि हिंसक रही है?क्या शोध की भी कोई अहिंसक दृष्टि हो सकती है?

                                    इन प्रश्नों पर विचार करने से पूर्व शोध की महत्ता सम्बन्धी इन प्रश्नों को  पर विचार किया जाना आवश्यक है,कि शोध किसलिए किये जाते हैं,क्यों किये जाते हैं?किसी भी तरह के शोध चाहे वह विज्ञान के हो,मानव विज्ञान के हो,समाज विज्ञान के हो,मनोविज्ञान के हो या अन्य, महत्त्व की कसौटी  इसी बात से पता  लगायी जा सकती है कि उन शोधो ने मानव समाज  को क्या दिया,मानव समाज की उन्नति के लिए क्या किया,यदि किसी भी तरह के शोध ने मानव समाज के मूल्यों को स्थापित करने में या उनके विकास में कोई योगदान नही किया है तो उस शोध का कोई अर्थ नही है ,वह निरर्थक है.

यहाँ पर जब मैं मानवीय मूल्यों की स्थापना की बात कर रहा हूँ तो निश्चित तौर पर समानता,प्रेम,सहिष्णुता,बंधुत्व आदि मूल्यों की बात कर रहा हूँ,यदि शोध इन मूल्यों के विकास में योगदान नही करता तो वह समाज के किसी काम का नही है. और इसी कसौटी पर कसकर ही इसकी महत्ता को जांचा परखा जाना चाहिए,और इसी महत्ता से तय होती है कि इस तरह के शोध की शोध प्रविधि क्या होनी चाहिए,तब निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि जो शोध प्रविधि समता,बंधुत्व,सहिष्णुता और प्रेम जैसे मूल्यों की स्थापना के लिए अपनायी जाए वही अहिंसक शोध प्रविधि कहलाएगी और इस दृष्टि को ध्यान में रखकर जो शोध किया जाए उसे शोध की अहिंसक दृष्टि कहा जाएगा.

    इसे समाज के सभी क्षेत्रों के शोधों पर लागू किया जाना चाहिए चाहे वह वैज्ञानिक शोध हो,समाजवैज्ञानिक शोध हो,मनोवैज्ञानिक शोध हो या अन्य.सभी शोधो के लिए यह एक अनिवार्य है.

    वर्तमान समय में समाज में यदि हिंसा बढ़ी है और ऐसे शोध जिनसे इसे विस्तार मिला है, वे शोध  और शोध प्रविधियां हिंसक कहलाएंगी,फिर चाहे वह आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक विषमता बढाने वाली रही हो या अन्य.

    यह अहिंसक शोध दृष्टि का दार्शनिक पक्ष कहा जा सकता है उसकी तत्व मीमांसा कही जा सकती है,इसके व्यवहारिक पक्ष की बात करें तो इस दर्शन के व्यवहारिक पक्ष को शोध के विभिन्न चरणों में लागू किया जा सकता है,ताकि एक अहिंसक शोध प्रविधि का निर्माण किया जा सके,फिर चाहे वह विषय चयन का मामला हो या आविष्कार का,सभी के उपयोग से उसकी खोज की पुष्टि की जा सकती है,शोध का वास्तविक महत्त्व इन्ही मूल्यों की स्थापना से है.

    इस तरह की शोध प्रविधि के विरोध में यह तर्क विकसित किया सकता है कि इसमें वैज्ञानिकता नही रहेगी या फिर कि यह पक्षपात पूर्ण होगा.इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि ऎसी वैज्ञानिकता किस काम की जो समाज को कुछ न दे सके,अंततः शोध समाज के लिए है न कि समाज शोध के लिए.
    दरअसल शोध में वैज्ञानिकता का दबाव बनाया जाता है ताकि परिणाम प्रभावित न हो,उसी शोध को वैज्ञानिक माना जाता है,पर आजकल के  औद्योगिक शोध,संचार शोध तो निष्कर्ष क्या निकालना है  इसलिए ही किये जाते हैं,

    वैज्ञानिकता के बारे में दरअसल कहा जा सकता है कि हमें अब तक  जो इसके बारे में बताया गया है ,या वैज्ञानिक बनने की जो ट्रेनिंग हमें दी गयी है या जो कंडीशनिंग की गयी है, उसे कभी भी हमने प्रश्नांकित करने की कोशिश नही की.वैज्ञानिक होने का मतलब किसी द्वीप पर अकेले खडा होना नही है,वैज्ञानिक होने का अर्थ है कि विज्ञान के उन सिद्धांतों की खोज करने वाला,जिसमे समाज की भलाई निहित है,उन मूल्यों की स्थापना के सिद्धांतों की खोज करना निहित है जो समाज के विकास में सहायक हो,वैज्ञानिक  भी समाज का एक अंग होता है और समाज के प्रति उसके वैज्ञानिक होने के कारण उत्तरदायित्व और अधिक बढ़ जाते हैं,कहने का आशय यह है कि जितनी अधिक उत्तरदायित्व की भावना होगी शोध में उतनी ही अधिक वैज्ञानिकता आयेगी.और विज्ञान के सिद्धांत भी इस बात को प्रमाणित करते है चाहे वह गुरुत्वाकर्षण का नियम की बात हो या विभिन्न अणुओं में उपस्थित ससंजक बल की या फिर जल या वायु के तत्वों के निर्माण की,सबमे वह संयोजक बल निहित है जिसे हम अहिंसा कहते है,वह तत्वों को जोड़ने की ही बात करता है न कि तोड़ने की .

    वर्तमान में हो रहे शोधों और शोध प्रविधियों को इसी कसौटी पर रखकर कसा जाना चाहिए ताकि शोध की महत्ता की जांच की जा सके और विषमता व्याप्त समाज में अहिंसा जैसे मूल्यों की स्थापना की जा सके .  

Wednesday, August 8, 2012

एक अहिंसक विचार की भ्रूण हत्या

एक अहिंसक विचार की भ्रूण हत्या
                                           टीम अन्ना ने राजनीति में आने की घोषणा करके देश के गुस्से को ठंडा कर दिया, क्रांति की आस को सेफ्टी वाल्व से जाने दिया, लेकिन ये उद्देश्य तो  अमरीकी एजेंटों का रहता है खैर वह सफल रहे ,लेकिन इस देश का एक बड़ा नुकसान कर दिया, जिसकी भरपाई अगले कई सालों तक नही की जा सकती, वह यह कि  जो लोग अनशन की ताकत को समझते थे और उसके फायदों और नुकसान को समझते थे उनके सामने इस हथियार की गंभीरता को भी नष्ट कर दिया, एक सफल अहिंसक विचार की  गलत समझ समाज में फैला दी.वह एक शिक्षक हो सकते थे पर उनकी ही समझ गलत निकली.अन्ना ने अहिंसा के हथियार को भोथा कर दिया.अब अगले कई साल अनशन के महत्त्व को समझने में लग जायेंगे,आंदोलन की भाषा को समझने में लग जायेंगे.आंदोलन को समझने में लग जायेंगे,अन्ना को जो लोग भी गांधी मानने लग गए थे, उनके भरोसे भी जल्दी टूट गए,बहरहाल यह समझना होगा कि आंदोलन की जनता जिसे अन्ना टीम भीड़ कहती रही, वह भी आंदोलन के नायकों के चरित्रों को  गढती है,यहाँ भी गढा परिणामस्वरूप  अन्ना को देश के अधिकाँश लोगों ने  गांधी बना दिया, पर अन्ना गांधी नही बन पाए.अन्ना को टीम अन्ना ही खा गयी,मेरा मतलब कि टीम अन्ना गांधी को खा गयी.अहिंसक साधनों को खा गयी,उस जज्बे को खा गयी जो लोगों में चार दशक बाद पैदा हुआ था.हालाँकि उत्तरआधुनिकता के इस दौर में किसी की छवि बहुत दिनों तक आदर्श बनकर नही रह सकती थी क्योकि यह सूचना का युग है जो निजी से निजी बातों का भी खुलासा कर देता है, ऐसे समय में कोई भी आदर्श कायम नही रह सकता, ऐसे समय में केवल एक बड़े परिवर्तन  की आवश्यकता थी वह संभावना बनी भी लेकिन सरकार ने  अपने ही विरोधी पैदा कर अपने विरोध का एक नाटक रचा और रही सही संभावना भी खत्म कर दी.यह खेल जनता के गुस्से को ठंडा करने के लिए ही खेला गया था क्योंकि मंहगाई,भ्रष्टाचार,तेल,गरीबी,अशिक्षा,भुखमरी आदि आदि समस्याओं ने देश में एक गुस्सा बनाया था जो चरम पर था, पर इन सरकारी व्यवस्था के एजेंटों ने उसको फुस्स कर दिया,क्रान्ति के एक भ्रूण की हत्या कर दी,इतिहास इन्हें कैसे याद करेगा यह विचारणीय है.दरअसल देश की जनता में राजनैतिक चेतना का अभाव है और उसी का लाभ इस टीम ने उठाया और सरकार ने इस टीम के माध्यम से उठाया.यह कहने में बिलकुल भी हर्ज नही है कि इस बार का अनशन सत्ता  वर्ग  ने ही कराया ताकि जनता में क्रान्ति के जज्बे को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए,वरना अभी कोई आवश्यकता नही थी अनशन की और ऐसा नही माना जा सकता है  कि यह बात टीम अन्ना को पता नही रही होगी,अभी न तो मानसून सत्र चल रहा था, न देश में कोई बड़ा राजनैतिक निर्णय लिया जा रहा था,न विश्व में कोई बड़ी  भारी उथल पुथल हो रही थी,किसी भी आंदोलन में समय का भी बड़ा महत्त्व होता है,आंदोलन का समय क्या रखा जाए गांधी ने हमें यह भी समझाया है,याद करें कि गांधी ने असहयोग आंदोलन को क्यों वापस ले लिया था, या दांडी यात्रा में कुछेक  ७२ लोगों का ही चुनाव क्यों किया था,क्या उस समय भीड़(टीम अन्ना के शब्दों में) गांधी के पीछे नही थी?क्या उस समय गांधी एक आवाज लगाते तो देश की पूरी जनता नही आ जाती या क्या उस समय के बड़े क्रान्तिकारियों ने दांडी मार्च में शामिल होना नही चाहा था?गांधी इस बात को समझते थे और जानते थे कि देश की जनता की ट्रेनिंग आंदोलन की ट्रेनिंग  नही है,इसलिए उन्होंने दांडी मार्च में चुनाव का विकल्प रखा और अन्य शामिल होना चाहने वाले लोगों से क्षमा मांग ली,पर आज भीड़ नही आने पर उत्साह और आंदोलन की भाषा सब बदल जाती है,इससे पता चलता है कि इस आंदोलन का विचार भीड़ से तय होता था विचार से नही,भीड़ से ही भाषा तय होती थी अहिंसा से नही,विचार और तरीके तो अहिंसक विचार के रखे लेकिन तय भीड़ से किया जनता से नही ,सब कुछ भीड़ से ही तय हुआ इसलिए भीड़ खो गयी तो आंदोलन भी खो गया.लेकिन यह बात गौर करने की है कि नुकसान किसका हुआ,कितना हुआ,दरअसल अव्वल तो विश्व (अमरीका) को  भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं  से भय है, दूसरा भय साम्यवादी विचार से है,ऐसे में तेल की राजनीति ने उसे एक सभ्यता (मुस्लिम) का विरोधी तो पहले ही बना दिया है,और अगर ऐसे में बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का फैलाव भी इन  देशों में हो जाता तो ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान उसे ही पहुचता है और यह हम हाल की आर्थिक मंदी में देख चुके हैं, साथ ही साथ यदि साम्यवादी विचारों का फैलाव भी हो जाए तो उसकी सामरिक ताकत का भी नुकसान उसे होता,इसलिए ऐसे देशों की सरकारों के माध्यम से और कुछ सरकारी एजेंटों,गैर सरकारी संगठनों आदि के माध्यम से एक प्रछन्न क्रान्ति रचकर जनता के गुस्से को ठंडा करा देना उस महाशक्ति के लिए एक आसान सा काम था जैसा कि उसने पहले भी हाल में हुई कुछ रंगीन क्रांतियों में इसके विपरीत देश को अस्थिर करने में किया, ऐसे में इन संगठनों और ऎसी सरकारों के चरित्र को समझना समय की अनिवार्य मांग है.ऐसे में वामपंथी विचार के पुरोधाओं की चुप्पी जरुर एक प्रश्नचिन्ह  है,इतिहास जरुर उनसे प्रश्न करेगा कि ऐसे समय में वे क्या कर रहे थे.क्या यह सही समय नही था.या अब  भी इंतज़ार की कलम से उनकी नियति लिखी गयी है,क्या ऐसे में उनका दायित्व जनता को राजनैतिक चेतना संपन्न बनाना नही था,समय की वस्तुस्थिति से अवगत नही कराना था,ऐसे कुछ प्रश्न हैं जिन पर विचार किया जाना बेहद जरूरी है.और अंत में समय और समाज से मुठभेड़ करती और स्वयं से सवाल करती मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में का अंश

"ओ मेरे आदर्शवादी मन,ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,भावना के कर्तव्य--त्याग दिये,हृदय के मन्तव्य--मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,जम गये, जाम हुए, फँस गये,अपने ही कीचड़ में धँस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!
अब तक क्या किया,जीवन क्या जिया,ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम...

Tuesday, July 3, 2012

फ्रेंज़ काफ्का के जन्मदिन पर

फ्रेंज़ काफ्का के जन्मदिन पर
‎"A first sign of the beginning of understanding is the wish to Die". Franz Kafka Diaries आज काफ्का का जन्मदिन है उनसे सम्बंधित साहित्य पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें http://www.kafka-franz.com/KAFKA-letter.htm

Wednesday, November 9, 2011

सचिन को अब संन्यास ले लेना चाहिए



सचिन जैसे महान बल्लेबाज़ जिन्हें लोग क्रिकेट का तथाकथित भगवान भी कहते हैं उन्हें अब अपने सौवें शतक के लिए जनता की दुआओं की जरुरत पड़ने लगी है ,ऐसे मैं निश्चित रूप से ये कहा जा सकता है कि सचिन मानसिक रूप से कमजोर हैं,हमने पहले भी देखा है कि सचिन नब्बे के आंकड़े पे आकर क्या हो जाते हैं ऐसे में क्यों न सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए ?क्योंकि महानता का अंत इस तरह नही होना चाहिए जैसा कि होता दिख रहा है.सौवें शतक के लिए अभी आस्ट्रेलिया की पिचों का इंतज़ार करना होगा,क्योंकि सचिन का रिकार्ड ये भी कहता है कमजोर टीमों के खिलाफ सचिन को शतक करने में मजा नही आता.इसलिए इन्तजारे लंबा है दोस्तों.........कहीं ऐसा न हो कि इंतज़ार इंतज़ार ही रह जाए..

Monday, November 7, 2011

ये हाकी क्या है?

जब गाँधी जी ने पूछा- हॉकी क्या है






महात्मा गाँधी उन दिनों इरविन से बातचीत में व्यस्त थे



1932 के ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए भारतीय टीम के पास पैसे नहीं थे. लोगों ने सलाह दी कि अगर गाँधी जी जनता से अपील करें तो पैसों का इंतज़ाम हो जाएगा. लेकिन गाँधी जी उन दिनों शिमला में थे. लॉर्ड इरविन से उनकी बातचीत चल रही थी. एक पत्रकार चार्ल्स न्यूहम को गाँधी जी से बातचीत करने का ज़िम्मा दिया गया था. जब न्यूहम ने गाँधी जी को इस स्थिति के बारे में अवगत कराया तो उनका पहला सवाल था- यह हॉकी क्या है? बस मिशन नाकाम हो गया. शायद उन दिनों गाँधी जी के दिमाग़ में देश की आज़ादी के लिए संघर्ष के सिवा कुछ भी नहीं था.



(स्रोत- मेजर ध्यानचंद की जीवनी द गोल से साभार)



Friday, November 4, 2011

गांधी, गांधी थे टीम गांधी नही

                                 
                                    टीम अन्ना की जुबान यदि तल्ख़ न होती,अन्ना यदि अधीर न होते,अनजाने में ही सही संघ की मदद नही कर रहे होते तो मैं भी उनके साथ होता,टीम अन्ना जब इस वक्त अपनी ओर मुडी सुई को सरकार की ओर मोडना चाह  रही है तब निश्चित तौर पर कुछ सवाल उठाना लाजिमी है.अन्ना को अनशन के बाद लिखित रूप से सरकार की ओर से जन लोकपाल बिल को पारित करने की स्वीकृति दी गयी थी,फिर अचानक अन्ना की उसी बात को लेकर पुनः अनशन करने की धमकी दिया जाना समझ नही आ रहा है.क्या अन्ना को अपनी गिरती हुई साख का अहसास हो रहा है इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं या फिर अन्ना का स्वयं ही अपनी टीम के सदस्यों पर से विश्वास उठता जा रहा है.इस मामले को भले  ही मीडिया ने इस तरह के साधारण और सामान्य से प्रश्न उठाकर गंभीरता से अलग कर दिया हो किन्तु इसके पीछे बड़ी और गंभीर किस्म की राजनीति की बू भी आ रही है.अव्वल तो यह कि टीम अन्ना को कहीं न कहीं अपनी राजनैतिक भूमि डगमगाती नजर आ रही है या फिर अन्ना जन लोकपाल बिल पास होने के बाद की स्थितियों पर बनने वाले अस्तित्व के संकट के विचार से घबरा रहे हैं.शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल बिल पास हो जाने के बाद टीम अन्ना क्या करेगी यह बड़ा प्रश्न उनके सामने है.इसके बाद भले ही टीम अन्ना कोई न कोई मुद्दा भले ही ढूढ निकाले तो क्या उसे भी इतना जन समर्थन मिल पायेगा जबकि इसी मुद्दे पर टीम अन्ना के अंतर्विरोध सामने आ गए हैं.अनशन समाप्ति के पश्चात अन्ना ने ‘'राईट टू रिजेक्ट’'के मुद्दे की बात कही थी लेकिन इसके इतना बड़ा मुद्दा बनने की गुंजाइश नही ही है क्योंकि निर्वाचन आयोग स्वयं ही पहले से इस पर विचार कर रहा है और हो सकता है कि अगले चुनावों में इसकी परिणति भी हो जाये,लेकिन अन्ना ने राईट टू रिजेक्ट ही क्यों चुना राईट टू रिकाल की बात क्यों दबी रह गयी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है.लोहिया और जयप्रकाश नारायण के दर्शन में जरुर इस अधिकार की बात की गयी थी परन्तु अब तक भारत में इस अधिकार की बात करने वाला उनके बाद कोई नही आया अन्ना भी नही.प्रश्न है कि राईट टू रिजेक्ट और जन लोकपाल बिल के परिणाम यदि भारत की भ्रष्टाचार की समस्या को सुलझाने और राजनीति में बेहतर नेताओं को पहुचाने में सफल नही रहे (जिसकी संभावना भी बहुत कम है लगभग न के बराबर) तब क्या होगा.अन्ना के पास इसके बाद क्या विकल्प है.जबकि अन्य देशों में जहाँ अब तक राईट टू रिजेक्ट था वहां भी अब इसे खत्म किया जा रहा है जबकि हम इसे अपनाने की बातें जोर शोर से उठा रहे है और ऐसे देश में जहाँ का मतदाता वोट देने ही नही जाता,ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं जो वोट नही करते ऐसे में यह अधिकार कितने लोगों को मिल पायेगा, मतदान के अधिकार का ही प्रयोग हम नही करते तो राईट तो रिजेक्ट का प्रयोग किसके लिए. जरुरत पहले राजनैतिक चेतना को बढाने की है, मतदान के अधिकार को अनिवार्य बनाने की है. मतदान के महत्व को गंभीरता से समझने की जरुरत है.तब ही हम एक अच्छे लोकतंत्र की उम्मीद कर सकते हैं न कि किसी पार्टी विशेष को हराने की घोषणा करके कि अमुख पार्टी को मतदान न करें,ऐसा करके हम नकारात्मकता को जन्म दे रहे हैं और अपनी नकारात्मक सोच को भी प्रदर्शित कर रहे हैं,यह सोच  बताती है कि ऐसे लोगों का लक्ष्य क्या है, जरुरत है एक अच्छी वैकल्पिक व्यवस्था को सामने रखने की,ऐसे में राईट टू रिजेक्ट की जगह राईट टू रिकाल को रखने कीजरुरत है,'राईट टू रिकाल' जरुर इस देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है.'राईट टू रिजेक्ट' के माध्यम से जनता को उम्मीदवारों को नकारे जाने का अधिकार पांच सालों में एक बार के लिए तो  अवश्य मिल जाएगा परन्तु उसके बाद अगले पांच सालों तक जनता क्या करेगी यह भी एक तरह की नकारात्मकता ही है इस अधिकार से उन उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने की सुविधा तो मिल रही है पर  बेहतर विकल्प के चुनाव की संभावना तब भी नही बन पा रही है,जबकि 'राईट टू रिकाल' में यदि गलत उम्मीदवार का चुनाव हो भी जाता है तो पांच सालों में कभी भी जनता उसके कार्यों का मूल्यांकन करके उसे वापस भी बुला सकती है और सरकार पर भी जनता का राईट टू रिकाल का दबाव बना रहेगा जिसके चलते सरकारें अपने तानाशाही स्वरूप में आने से भी बचतीं रहेंगी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण बना रहेगा साथ ही देश का पैसा बार बार होने वाले चुनावों में खर्च होने से भी बचा रहेगा,तब वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना संभव हो पायेगी.
टीम अन्ना के मंतव्यों पर संदेह करने के और भी कारण हैं,दरअसल टीम अन्ना में जो लोग हैं उनके सम्बन्ध गैर सरकारी संगठनो से हैं जिन्हें विदेशों से फंड प्राप्त होते हैं खासकर अमेरिका से और अन्य देशों से,ये कौन सा पैसा है जो वेलफेयर के नाम पर आता है,क्या इसमें भ्रष्टाचार का पैसा नहीं है यह किसी से छुपा नही है,कोई भी लाभ(सरप्लस) बिना शोषण के नही बनाया जा सकता,और कहीं भी ऐसे धन को लगाने का उद्देश्य कहीं न कहीं राजनैतिक अस्थिरता को फैलाने के लिए ही किया जाता रहा है.हाल ही में मिश्र और अन्य देशों के उदाहरणों से हम समझ सकते हैं,जहाँ जहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ है वहां के किन लोगों ने रंगीन क्रांतियां की हैं और किन लोगों को वहां सत्ता परिवर्तन का लाभ पहुंचा है ये देखा जाना जरूरी है.ऐसे सभी देशों में गैरसरकारी संगठनों ने ही अग्रणी भूमिका निभायी है और अंततः लाभ भी अमेरिका को ही हुआ है.ऐसे में अन्ना के आंदोलन से भी यदि अमेरिकापरस्त किसी पार्टी को लाभ पहुँच रहा है तो इसमें क्या आश्चर्य है. हो सकता है कि कुछ जनसंगठन भी इसमें शामिल हो और उनका ध्येय भी ठीक हो किन्तु वह भी तो कहीं न कहीं इस अनशन से उभरे जनउभार(जनता के व्यवस्था के गुस्से )को नष्ट करने का काम ही कर रहे हैं, ऐसे में अन्ना की  महात्मा या गांधी से कैसे तुलना की जा सकती है,गांधी ने पहले पश्चिमी सभ्यता का विरोध किया स्वराज की मांग की और अंत में अपनी ही पार्टी में फ़ैल गए भ्रष्टाचार के चलते कांग्रेस को भी भंग कर देने की मांग की,अन्ना को अभी गांधी से बहुत सीखने की जरुरत है ,गांधी के पास अगली सदी तक का अजेंडा था और वे आज भी समकालीन बने हुए हैं.लेकिन गांधी गांधी थे टीम गांधी नही.



                                                                                                           

Monday, February 9, 2009

हरसूद और मीडिया

हरसूद और मीडिया म।प्र. के खंडवा जिले का ७०० साल पुराना एक शहर है(था)हरसूद! लोक में हरसूद के बारे में मान्यता है कि यह राजा हरिश्चन्द्र के शासनाधीन नगर रहा है,बडे बूढे आज भी कहते हैं कि हरिश्चन्द्र का सत्यव्रत जैसे जैसे बढता गया और फलित होता गया वैसे वैसे उनका राज्य विस्तार भी बढता गया,उसी बढत के कारण हरसूद का विस्तार पश्चिम दक्षिण में है,राजा हरिश्चन्द्र भगवान राम के पूर्वज थे,इक्ष्वाकु वंश का गौरव इस देश के साथ एक गहरी सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुडा हुआ है. उत्तर में नर्मदा नदी,दक्षिण में वरूपारेल नदी,पूर्व में कालीमाचक नदी और पश्चिम में छोटी तवा नदी के बीच हरसूद का उपजाऊ और जन आत्मीय संपन्न भू भाग फैला है,हरसूद केवल एक बडे गांव का नाम नही था,बल्कि इतने बडे भू क्षेत्र के निवासियों के जीवन की धडकनों का केन्द्र था,लगभग ५०० गांवों की हलचलें हरसूद के साथ जुडीं थीं,प्रत्येक खेत के दाने हरसूद मे६ बिकते थे,रोते थे,मर जाते थे,हरसूद का बजार इन गावों के घरों में घुसकर धमाल मचाता था,इन गांवों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सूत्र हरसूद के माध्यम से जुडे थे,हरसूद हाट बाजार का स्थान नही था,सगे संबंधियों,स्वजनों परिजनों का मिलन बिन्दु और सामूहिक विवाहों,सामाजिक कार्यों का केंद्रस्थल भी था,सामाजिकता को यदि बाजार का आधार होता तो वह जगह हरसूद ही होती थी,वस्तु किसी भी कंपनी की हो,कहलाती थी हरसूद की,"हरसूद से लाये हैं". लेकिन अब हरसूद एक स्वप्न है,और पंडित जवाहर लाल नेहरू के भारत को आधुनिक बनाने के स्वप्न की शुरूआत ही होती है बांध परियोजनाओं के निर्माण से,जहां एक ओर इस परिकल्पना को लेकर विकास किया जा रहा था,वहीं दुसरी ओर आजादी के बाद भी भारत आर्थिक,सामाजिक और राजनैतिक रूप से अभी भी पिछडा हुआ ही था,ऐसे में परियोजनाओं के तहत बांधों के निर्माण की घोषणा और उनसे होने वाले विस्थापन को राष्ट्रहित में बलिदान जैसे तर्कों से तर्कसंगत बनाने का काम भी किया जा रहा था और सफल भी हो रहा था,परंतु जैसे जैसे लगातार आधुनिक होते जाने की दिशा में उन परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाना शुरू हुआ,भारत में राजनैतिक सजगता भी बढी और अपने अधिकारों को लेकर लोगों में प्रतिरोध की संस्कृति भी पनपने लगी,इस प्रतिरोध की प्रथम कडी इसी हरसूद शहर में ८० के दशक में मिलती है,जहां पहली बार २५० समाजसेवी संगठन प्रमुखों ने विकास की इस अवधारणा के बरक्स 'मानव श्रंखला'बनाकर प्रतिरोध की सुरूआत की,हालांकि मानवता के तहत इस तरह के प्रतिरोध तो आरंभ से ही देखने मे आ रहे थे! इस प्रकार ५० के दशक के मध्य से लेकर अब तक लंबा अंतराल दिखायी देता है जिसमें प्रतिरोध की कोई व्यापकता नजर नही आयी और जब ८० के दशक में इसकी शुरूआत हुई भी तो इन परियोजना के रहनुमाओं ने प्रतिरोध को समाप्त करने के व्यापक उपाय पहले ही कर लिये थे,जिनमें शामिल था विस्थापितों को मुआवजा देना,नये पैकेजों की घोषणा करना और भविष्य को लेकर एक ऐसी सुनहरी कल्पना बेचना जिसमें सहज मानव बुद्धि निश्चित ही धोखा खा जाये, और हुआ भी यही कि प्रतिरोध की शुरूआत जिस जगह से हुई उस जगह को ही डुबा दिया गया और प्रतिरोध की परिणति केवल मुआवजों के समान वितरण को लेकर मात्र ही रह गयी,इसके कारण क्या रहे? यह मेरे शोध प्रबंध में है लेकिन विषय सीमित है इसलिये मै अपने विषय पर ही बात करता हूं. नर्मदा सागर बांध परियोजना की बात ५० के दशक में हुई,पर काम उसी समय सुरू नहि हुआ,राज्यों के बीच नये नये विवाद खडे होते रहे,इनका हल १९७२ में हो पया,'मास्टर प्लान' बना था १९७२ में,वह केंद्रीय जल और विद्युत आयोग के दो दशकों तक किये गये परीक्षणो के आधार पर बना था,उसकी मूल कल्पना बनी थी १९६५ में उसी पुरानी खोसला समिति की रिपोर्ट के अनुसार ही थी,इस बीच परियोजना की सक्षमता के बारे में भी कई सवा उठे. जरा एक नजर परियोजना के लागत लाभ अनुपात पर डालें,सिंचाई:- इस परियोजना का लक्ष्य १ लाख२३ हजार हेक्टेयर भूमि पर सिचाई का बताया गया है जिसके तहत ९१ हजार हेक्टेयर भूमि कीमती,शुष्क पतझडी वन,२४९ गांव और एक शहर हरसूद कस्बा शामिल था. "पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की समीक्षा समिति के १९९३ में तैयार की गयी एक रिपोर्ट मे६ अनुमान लगाया गया था कि डूबने वाले जंगल की कीमत तकरीबन ३३,९२३ करोड रूपये होगी" १९९४ में पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी गयी इसकी प्रबाव आकलन रिपोर्ट मे कहा गया है कि "नर्मदा सागर और ओंकारेश्वर परियोजना के सम्मिलित विनाशकारी प्रभावों की क्षतिपूर्ति न तो संभव है और न ही इसके बारे में कुछ सुझाया गया है,इसे तो भविष्य में मिलने वाले सामाजिक आर्थिक लाभ के लिये चुकाई जाने वाली कीमत ही मानना होगा. जैसा कि होता रहा है ,सभी चेतावनियों को नजरांदाज कर दिया गया. ४२,००० हेक्टेयर के करीब जंगल डूब मे६ आने वाला था,खुद श्रीमती गांधी ने परियोजना का शिलान्यास करते हुए २४ अक्टूबर १९७४ को कहा था-"मैं जंगलों को काटने और बडे बांध बनाने के पक्ष में नही हूं". केंद्रीय सरकार के अंतरिक्ष विभाग ने उपग्रह छायाचित्रों से वनों के अध्ययन द्वारा अपनी एक रिपोर्ट में म.प्र. सरकार को चेतावनी भी दी है.१९८४ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी तीव्र गति से वन विनाशजारी रहने पर अगले १० वर्षों में'संपूर्ण पारिस्थित्कीय विनाश' होगा दुर्भाग्यवश जिन २९ जिलों में अंधाधुंध विनाश को देखा गया है,उसमें नर्मदा सागर की डूब में आने वाले तीनो जिले-खंडवा,होशंगाबाद और देवास शामिल हैं. बिजली:- बांध की कुल बिजली उत्पादन क्षमता १००० मेगावाट बतायी गयी है अर्थात यह कुल मशीनी क्षमता है जबकि हम जानते हैं कि बिजली उत्पादन क्षमता पानी के प्रवाह पर निर्भर करती है.परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट विद्युत उत्पादन क्षमता २१२ मेगावाट ही बताती है और जब नहरें चालू हो जायेगी तब यह क्षमता घटकर १४७ मेगावाट ही रह जायेगी! पानी की क्षमता संबंधी अनुमान था कि नर्मदा का सालाना औसत प्रवाह ४१ वी. एम. होगा,लेकिन निर्भर तो ७५% पर ही किया जा सकता है इसलिए उसकी मात्रा ३३.९ वी.एम.(यानी ऊपरी प्रवाह २२.५ और भूगत प्रवाह ११.४ वी.एम.) होगी.अध्ययन बताते हैं कि ९०% बहाव बरसात के महीने में होता है,बेंगलोर स्थित इंडियन इंस्टीट्युट आफ मैनेजमेंट के अध्ययन से मालूम होता है कि (पिछले ३१ सालों के हिसाब से)नदी में आज उतना पानी नही है. एन.एच.पी.सी. का कहना है कि जब यह परियोजना पुरी हो जायेगी तो इससे औसतन तकरीबन दो अरब यूनिट बिजली का उत्पादन होगा,इस समय म.प्र. में बिजली का ४४.२० फीसदी-१२ अरब यूनिट बिजली-प्रतिवर्ष पारेषण(ट्रांसमिशन) मे और वितरण में नष्ट हो जाता है.यह छह नर्मदा सागर परियोजना के बराबर होती है. एन.एच.पी.सी. की अपनी प्रचार सामग्री के ही अनुसार उत्पादित बिजली की कीमत 'बस बार'(यानी बिजलीघर के दरवाजे पर)रू.४.५९ प्रति यूनिट होगी,जिसका अर्थ है कि उपभोक्ता तक आते आते यह ७ रू. प्रति यूनिट हो जायेगी. इन सभी लागत लाभ अनुपात से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह परियोजना कितनी और किसके लिये लाभकारी है? एक अन्य उदाहरण में नदी की जलशास्त्रीय जटिलताओं का भी खयाल नही रखा गया है या उन्हें सामने नही लाया गया है, जलविग्यानी बताते हैं कि कई जगह नदी तल में ऐसे दह बने हुए हैं जहां नीचे से पानी आता है तो कई जगह नदी का पानी जमीन के नीचे भी जा रहा है,नर्मदा नदी बडी दरार वाले इलाके से बहती है,यह दरार भारत को दो बिल्कुल भौगोलिक क्षेत्रों में बांटती है,दरार वाले इलाकों में भूकंप की भविष्यवाणी संबंधी अध्ययन मे लगे एक प्रोफेसर के अनुसार "नर्मदा घाटी विकास कार्यक्रम के अंतर्गत थोडे से इलाके में बहुत सारे जलाशयों के निर्माण की योजना के कारण भूकंप की संभावना बढ गयी है". म.प्र. के भूतपूर्व पर्यावरण आयुक्त श्री एम.के.शर्मा का भी कहना है कि "यह सब जानते है कि नर्मदा घाती बिखरे भूखंडो का इलाका है इसलिये यहां जलाशयों के बनने से उनके परिणामस्वरूप भूकंप की समस्ययें पैदा हो सकतीं हैं" इस बीच अनेक संगठनों ने भौगोलिक अध्ययन किये हैं लेकिन उन संगठनो की रिपोर्टों को अधिकारियों ने प्रकाशित नही किया,किसी को दिखाया नही.बांध क्षेत्र में नियुक्त इंजीनियर और भोपाल स्थित नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधिकारी कहते हैं कि वे सारे अध्ययन केंद्र सरकार ने करवाये हैं जिनमें नेशनल जियोफिजिकल इंस्टीट्युट भी शामिल है.बताया जा रहा है कि सर्वे करने वाले सभी 'सैंपल'दिल्ली गये हैं,इसलिये म.प्र. के विभागों को,सिचाई इंजीनियरों को कुछ मालूम नही है. हरसूद में मीडिया की भूमिका को इन्ही तथ्यों से जोडकर तीन तरह से देखा जा सकता है जहां जहां मीडिया का हस्तक्षेप हो सकता है. १. उन जानकारियों को लाने में जिनकी जानकारी जनता कओ नही है.२. प्रक्रियाओं में होने वाली अनियमितताओं की जानकारियों को उजागर करने में.३. और विचारधारात्मक रूप से यदि मीडिया का स्वरूप प्रतिरोधक है तो उसको एक दिशा मे मजबूती से व्यापक बनाने में, इनके अलावा एक तीसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि देखने में मीडिया का स्वरूप प्रतिरोधात्मक तो लगे किन्तु वास्तविक स्वरूप कुछ और ही हो. चूंकि परियोजना के बनने और लागू होने में ४० वर्षों का अंतराल था और यही वह समय था जब मीडिया का दायित्व (यदि लोकतंत्र का चौखंभा है तो) था कि वह लोगों को समुचित जानकारी उपलब्ध कराये और डूबने और नही डूबने की अनिश्चितता में संतुलन बनाये, इसके अलावा परियोजना की अनियमितताओं की जानकारी दे.डूब क्षेत्र के लोगों को तो यह जानकारी भी नही थी कि जिस एक्ट के तहत उनका विस्थापन किया जा रहा है उसका निर्माण १८९४ में ब्रिटिश शासनकाल मे हुआ था जिसका नाम 'भूमि अधिग्रहण एक्ट' था इसमें 'जनहित' के नाम पर भूमि के अधिग्रहण का प्रवधान था. यहां गौर करने वाली बात यह है कि ब्रिटिश सरकार का भारत आने का उद्देश्य व्यापारिक एवं आर्थिक था न कि समाज कल्याण,अत: भूमि अधिग्रहणे एक्ट-१८९४ के साथ पुनर्वास नीति या एक्ट का नही लया जाना समझ मे आता है,लेकिन आजादी के बाद भी गुलामी की इस प्रवत्ति को ढोना समझ मे नही आता!जहां पुनर्वास विस्थापितों का मौलिक अधिकार होना चाहिये,वहां पुनर्वास सुविधा के किसी नियम या कानून का नही होना लोकतांत्रिक व्यवस्था को निराधार साबित करता है. इस तरह परियोजना से संबंधित नियमों और कानूनी जानकारी लोगों को कही से नही मिल पायी,यहां तक कि सरकार द्वारा लागू की जाने वाली योजनाओं की वास्तविकताओं से परिचय कराना तक उचित नही समझा गया.इनमें से कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं जैसे:- संवैधानिक दायित्वों और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन,पेसा कानून,ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट,अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन संधि १०७ आदि. इसके अलावा हरसूद में सरकार द्वारा की जानेवाली ज्यादतियों की तरफ भी इनका ध्यान नही गया. १. विस्थापितों को भ्रामक और अधूरी जानकारी दी गयी२. गांववासियों के खिलाफ बल प्रयोग३. अपर्याप्त मुआवजा४. प्रभावितों की सुची में अनियमितता आदि. इस तरह की विभिन्न जानकारियों के प्रति जनसंचर माध्यमों का उत्साह कहीं नही दिखाई देता है.कहा जा सकता है कि ५० के दशक से लेकर अब तक के लंबे अंतराल को पाटने में जनसंचार माध्यमों की खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की कोई भूमिका नजर नही आती. इस तरह जनसंचार माध्यमों की मूक दृष्टि कही न कही सरकारी और पूंजीवादी नियंत्रण को ही दर्शाती है लेकिन उत्सव और ग्लैमर के अपने चरित्र को प्रतिस्पर्धा के आज के दौर मे भुनाना मीडिया का एक नया चरित्र निर्माणकरता है,ऐ सका उदाहरण भी हरसूद का डूबना है जहां कुछ दिनो पूर्व से ही प्रिन्ट और इलेक्त्ट्रानिक मीडिया के गढ स्थापित कर लिये जाते है डूबने के उत्सव को अपने अपने ढंग से परोसने के लिये, हरसूद अचानक सुर्खियों में आ जाता है, सभी जगह हरसूद छा जाता है. ३० जून २००४ से लेकर ३० जून २००५ तक मीडिया का खेल भी कही न कही इस तंत्र की बनावटी तस्वीर पेश करता है जब मीडिया ने हरसूद को बिना डूबे ही डूबा हुआ दिखाया.यह स्थिति नर्मदा सागर बांध के पानी के २५४ मीटर के स्तर पर बनी थी तब हरसूद के मुख्य बाजार में पानी फैल गया था.यह कही ६ इंच और कही १-२ फीट तक ही था, हां नाले के किनारे के हिस्से में अवश्य ५-१०फीट पानी एकाध जगह था. यह भी बरगी बांध के नौ द्वार खोलकर कृत्रिम बाढ की स्थिति निर्मित की गयी थी जिससे हरसूद के हटाने को न्यायसंगत ठहराया जा सके. मुआवजे को लेकर भी जनसंचार माध्यमों ने खबरों का चुनाव भी कुछ इस तरह किया जैसे मुआवजे का यह वितरण एक उत्सव सरीखा हो. एक खबर के अनुसार मुआवजे की राशि से खरीदे गये वाहनो पर लोगों ने मां नर्मदा कृपा लिख्वा लिया है, इस खबर में इस्माइल लहरी का एक कार्टून भी छपा जिसमें एक आदिवासी अपनी अर्धांगिनी को मोटरसायकिल पर बिठाये जाझा था और आसपास से आवाजें आ रहीं थीं- मुआवजा एक्सप्रेस...मुआवजा एक्सप्रेस. एक अन्य खबर में दैनिक भास्कर इंदौर ने हरसूदवासियों के साथ घिनौना मजाक भी किया जिसमें वह अपने पूंजीवादी चरित्र की चरम परिणति को प्रदर्शित करता है. दैनिक भास्कर इंदौर पेज १५ न्यू हरसूद विजन २०२४ के नाम से १ जुलाई २००४ को सोमवार को छापा गया जिसमे हरसूदवासियों के कल्पित भविष्य को गढने की कोशिश की गयी. खबर के अनुसार हरसूद शहर की छवि कुछ इस तरह होगी. यहां केवल सुर्खियों को ही लिया जा रहा है.विस्तृत व्यौरा शोध प्रबंध में है.१. यू.एन.डी.पी. की बैठक न्यू हरसूद के ऐलैन्ड होटल में होगी,२. विश्वस्तरीय स्कूल को पायलट प्रोजेक्ट माना, ३. हाट स्पाट में बिजली का उत्पादन चार गुना होगा,४. हाई स्पीड शिप सर्विस का नया नेटवर्क स्थापित होगा,५. वर्ल्ड फिश फेस्टीवल का आयोजन दिसंबार में किया जायेगा,६. यह विश्व का सबसे ज्यादा प्रदूषण मुक्त क्षेत्र होगा, ७. हरसूद वाटर टेनिस २०२८ के लिये दावेदारी प्रस्तुत करेगा,८. रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर के लिये मिट्स वे माइक्रोसोफ्ट ने हाथ मिलाये.९. हरसूद की प्रतिमाओं की तलाश के लिये एम.ओ.यू. साइन,१०. आर्यन खान(शहरूख खान के पुत्र) की पहली फिल्म'सब कुछ होता है' की शूटिंग न्यू हरसूद में होगी. ११. लुभाने लगी डाल्फिन की अदायें. हरसूद के डूबने के समय ही केवल मीडिया का इस तरह का रूख दिखाई देता है और केवल हरसूद को ही प्रकाश में लाने का स्पष्ट कारण यहां के मुद्दों से जुडने वालीं महान हस्तियों का आना मत्र ही था. अरूंधति राय के हरसूद आने के बाद से ही मिडिया ने अपने पांव वहां रखे थे. इसके बाद भी ९१ गांव अभी भी डूब की सूची में हैं जिनकी तरफ मीडिया का ध्यान ही नही है. हां यदि जनसंगठनों के माध्यमो की चर्चा करें तो उनका काम अवश्य ही सराहनीय रहा लेकिन अनुप्लब्ध साधनों और संसाधनो की कमी से उनहें व्यापक सफलतायें नहीं मिलीं फिर भी उनके प्रयास उनके प्रतिरोधक साहित्य के साथ ही आज भी जारी हैं जिनके माध्यम से लोगों को जानकारी देने के साथ ही उनमें प्रतिरोध की संस्कृति का निर्माण करने तक वैधानिक ढंग से उनका काम काबिले तारीफ रहा है. इस तरह जनसंचार माध्यमो की हरसूद में भूमिका को देखते हुए पुन: उस विमर्श की तरफ एक सशंकित नजर जाती जिसमें पूंजीवाद को उसकी कमियों से ढह जाने की एक अशाभरी किरण नजर आती है.इस तरह अरूंधति राय के पावर पालिटिक्स लेख के उन शब्दों की याद आती है कि॥ "जब सूचना क्रांति की अगली कतार में भारत की चमत्कारी छलांग का इतिहास लिका जयेगा,तो साथ ही यह भी कहा जा जाना चाहिये कि पांच करोड साठ लाख भारतीयों ने(और उनके बच्चों,एवं उनके भी बच्चों ने) इसके लिये अपना घर,अपनी जमीन,अपनी भाषा,अपना इतिहास,यानी अपना सब कुछ गवां दिया... मानव समुदाय को तो कीमत चुकानी ही पडी, पर्यावरण को भी इसका मूल्य अदा करना पडा,पचास लाख हेटेयर से भी अधिक क्षेत्रफल में जंगल डूब गये,पारिस्थितकीय प्रणाली तबाह हो गयी,नदियां नष्ट हुईं,सूखीं,जलग्रहण क्षेत्र बालू से पट गये,वन्य जीवन संकटग्रस्त हो गया,जैव विविधता विलुप्त होने लगी और दस लाख हेक्टेयर कृषि भूमि अब तक पानी और कीचड में डूबी हुई है".